बेबीकॉर्न मके की खेती

भारतवर्ष में इसकी खेती पर अब खाद्य-प्रसंस्करण उद्योग को ध्यान में रखते हुए प्रगति के क्षेत्र में एक नई उपलब्धि सब्जी एवं खाद्य- उत्पादों (Vegetables and Food Products) के लिये अधिक ध्यान दिया जा रहा है । यह एक मक्का या भुट्‌टा का ही स्वरूप है । ‘बेबीकोर्न’ शब्द का तात्पर्य शिशु-मक्का से है जिसमें पौधे के मध्यम भाग पर गुल्ली या पिंदया निकल आती है जो रेशम जैसी कोमल कोंपल के साथ वृद्धि कर उग आती है । बेबीकोर्न (शिशु-मक्का) कहलाता है । यह एक अत्यंत स्वादिष्ट एवं पोषक-युक्त उत्पाद है । जिसकी आजकल भारत एवं विदेशों जैसे- थाईलैंड और ताइवान निर्यातक देश के रूप में उभरे हैं । कृषकों ने इसको बड़े स्तर पर व्यवसाय के रूप में विकसित कर लिया है । भारतीय मक्का उत्पादक बेबीकार्न से अभी तक उपयोग एवं आर्थिक महत्त्व से अपरिचित थे । यही कारण है कि अभी तक बेबीकोर्न का प्रचलन नहीं हो पाया । अब मक्का उत्पादक इसको भी सही एवं उसी तरह से उगा सकते हैं तथा मक्का की अपेक्षा 3-4 गुणा अधिक शुद्ध लाभ भी प्राप्त होता है ।

बेबीकोर्न की खेती का विकास धीरे-धीरे होता जा रहा है । शहरों के आस-पास कृषकों एवं ग्रामीण नवयुवकों व अन्य लोगों के रोजगार के अवसर बढ़ते जा रहे हैं तथा अन्य अवसर उपलब्ध होने से आर्थिक स्थिति को भी बढ़ावा मिलेगा जिससे मक्का-उत्पादन क्षेत्रों में बेबीकोर्न को उगाना आसान है तथा ऐसे क्षेत्रों एवं प्रान्तों, राज्यों की मुद्रा अर्जित करने के अवसर भी बढ़ेंगे । इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि विदेशी मुद्रा को अधिक एकत्र किया जा सकता है । हमारे देश में मक्का के साथ बेबीकोर्न को उगाकर आर्थिक स्थिति में सुधार करना तथा अधिक लाभ प्राप्त करना होगा क्योंकि कृषि जलवायु की परिस्थितियों के अनुसार वर्ष में 3-4 बेबीकोर्न की फसलें ली जा सकती हैं । बेबीकोर्न उत्पादन का शोध कार्य सर्वप्रथम सन् 1993 से मक्का अनुसंधान निदेशालय द्वारा हिमाचल प्रदेश, कृषि विश्वविद्यालय के क्षेत्रीय अनुसंधान केन्द्र, बजौरा (कुल्लू घाटी) में आरम्भ हुआ । तब ही से बेबीकोर्न के रूप में मक्का की खेती का प्रचलन बढ़ता जा रहा है । लेकिन अभी भी सम्पूर्ण भारत में बेबीकोर्न के उद्योग एवं उत्पादन के विकास का विस्तार निजी एवं सरकारी दोनों क्षेत्रों को सघन एवं अत्यधिक प्रयासों को बढ़ावा देना होगा जिससे धीरे-धीरे उचित किस्म, अधिक उत्पादन-तकनीक की उपलब्धता तथा सभी उत्पादन या कृषि-क्रियाओं का समावेश करना होगा जिससे उत्पादकों को बाजार आसानी से मिल सके ।

बेबीकोर्न (Baby corn) की उपयोगिता एवं पोषक-तत्वता का एक विशेष महत्त्व है क्योंकि यह एक स्वादिष्ट, पोषक-तत्व वाली सब्जी है जिसमें अधिक पोषक तत्व जैसे- कार्बोहाइड्रेट्‌स, कैल्शियम, लोहा, वसा, प्रोटीन तथा फास्फोरस की मात्रा अन्य मुख्य सब्जियों जैसे- फूल गोभी, पत्ता गोभी, टमाटर, सेम, भिन्डी, गाजर, बैंगन, पालक आदि से अधिक पाई जाती है । इसके अन्तर्गत कॉलेस्ट्राल रहित रेशों की अधिक मात्रा पाई जाती है जिससे यह कैलोरी युक्त सब्जी है । इसकी बालियों या गिल्लियों को कच्चा खाया जा सकता तथा इसी से अनेक भोजन युक्त खाद्य तैयार किये जाते हैं । जैसे- चीनी खाद्य, विभिन्न सूप, मीट (Meat) एवं चावल के साथ तलकर, चाइनीज फूड में मिक्स करके, अचार, सलाद के रूप में, सब्जियों के साथ मिक्स करके तथा बेसन कार्न-पकौड़े आदि के रूप में खाते हैं तथा डिब्बाबन्दी द्वारा इसे संसाधित किया जा सकता है ।

आवश्यक भूमि व जलवायु

यह सभी प्रकार की मिट्‌टी में उत्पन्न की जा सकती है जहां पर मक्का की खेती की जा सकती है वहीं पर यह खेती भी की जा रही है । अर्थात् सर्वोत्तम भूमि दोमट-भूमि जो जीवांश-युक्त हो उसमें सुगमता से खेती की जा सकती है तथा मिट्‌टी क्रा पी.एच. मान 7.0 के आस-पास का उचित होता है ।बेबीकोर्न के लिये हल्की गर्म एवं आर्द्रता वाली जलवायु उत्तम रहती है । लेकिन आजकल कुछ किस्में जो संकर हैं, वर्ष में तीन-चार बार उगायी जाती हैं तथा ग्रीष्म एवं वर्षाकाल इसके लिए उपयुक्त रहता है ।

मक्का की उन्नत किस्में

बेबीकोर्न (मक्का) के उत्पादन हेतु मक्का की चार श्रेष्ठ किस्में हैं जो निम्नलिखित हैं जिनमें तीन संकर एवं एक देशी चयन की हुई है-

1)संकर-बी.एल. 42)संकर-एम.ई.एच.-133 3)संकर-एम.ई.एच.-114)अर्ली-कम्पोजिट

उपरोक्त किस्मों में से बेबीकोर्न का आकार लगभग लम्बाई 17.0 से 18.8 सेमी. तथा व्यास 15.3 से 1.74 सेमी. छिलका सहित तथा छिलका रहित (गिल्ली) लम्बाई 8.2 से 9.3 सेमी. तथा व्यास 1.16 से 1.18 सेमी. के बीच होता है तथा पौधों की ऊंचाई 164 से 200 सेमी. तक होती है जो 48 से 58 दिन में काटी जा सकती है ।

खाद एवं उर्वरक

सड़ी गोबर की खाद 10-12 टन प्रति हैक्टर तथा नत्रजन 150-200 किग्रा, फास्फोरस 60 कि.ग्रा. तथा पोटाश 40 कि.ग्रा. प्रति हैक्टर दें । नत्रजन को तीन भागों में बांटे । प्रथम भाग बुवाई के समय, फास्फोरस व पोटाश भी इसी समय दें । नत्रजन का दूसरा भाग 20-25 दिन बाद सिंचाई के तुरन्त बाद दें तथा तीसरा भाग बल्लियां निकलनी आरम्भ होने के समय देने से बल्लड या बेबीकोर्न की अधिक उपज मिलती है ।

बीज की मात्रा

बेबीकोर्न प्राप्त करने हेतु 30-40 कि.ग्रा. प्रति हैक्टर बीज की आवश्यकता होती है ।

बुवाई का समय एवं विधि

बीज की बुवाई वर्ष में तीन या चार बार की जा सकती है । इसलिये प्रथम बुवाई मार्च-अप्रैल, जून-जुलाई, सितम्बर-अक्टूबर तथा कम ठंड वाले क्षेत्रों में दिसम्बर-जनवरी के माह में भी की जा सकती है । दिल्ली के आसपास के क्षेत्रों में तीन मुख्य फसलें ली जा सकती हैं जिनकी अवधि 50-60 दिन की होती है । बुवाई की विधि आमतौर पर पंक्तियों में की जाती है । इन पंक्तियों से पंक्तियों की दूरी 40 सेमी. तथा पौधे से पौधे की आपस की दूरी 20 सेमी. रखते हैं क्योंकि पौधे अधिक बड़े नहीं होते हैं । बुवाई देशी हल या ट्रैक्टर द्वारा करनी चाहिए । बीज की गहराई 3-4 सेमी. रखनी चाहिए तथा बोते समय नमी पर्याप्त मात्रा में हो । इस प्रकार से इस दूरी की बुवाई का लगभग 1,50,000 पौधों की संख्या प्रति हैक्टर प्राप्त होगी ।

सिंचाई

सर्वप्रथम सिंचाई बुवाई से पहले करे क्योंकि बीज अंकुरण हेतु पर्याप्त नमी का होना नितान्त आवश्यक है । बुवाई के 15-20 दिन बाद मौसमानुसार जब पौधे 10-12 सेमी. के हो जायें तो प्रथम सिंचाई करनी चाहिए तत्पश्चात् 12-15 दिन के अन्तराल से सर्दियों की फसल में तथा 8-10 दिन के अन्तराल से ग्रीष्मकालीन फसल में पानी देते रहना चाहिए । क्योंकि बेबीकोर्न या गिल्ली बनते समय पर्याप्त नमी होनी आवश्यक है ।

खरपतवार–नियन्त्रण

वर्षा एवं ग्रीष्मकालीन फसल में कुछ खरपतवार या जंगली घास हो जाती हैं । जिनको निकालना जरूरी होता है । अन्यथा मुख्य फसल के पौधों से खाद्य प्रतियोगिता करेंगे । अर्थात् इन्हें निकालने के लिये 2-3 खुरपी से गुड़ाई करें क्या साथ-साथ हल्की-हल्की मिट्‌टी भी पौधों पर चढ़ावे । जिससे पौधे हवा में गिर न पायें ।

बेबीकोर्न की तुड़ाई

जब शिशु-गिल्लियों (बेबीकोर्न) को भुट्‌टे के छिक्कल से रेशमी कोंपल निकलने के 2-3 दिन के अन्दर ही सावधानीपूर्वक हाथों से तोड़ना चाहिए जिससे पौधे की ऊपरी व निचली पत्तियां टूटने न पायें । इस प्रकार से शिशु गिल्लियों को हर तीसरे-चौथे दिन अवश्य तोड़ें । इस प्रकार की वर्तमान किस्मों से 4-5 गिल्लियां प्राप्त कर सकते हैं ।

उपज

बेबीकोर्न मक्का की एक फसल से 20-25 क्विंटल प्रति हैक्टर औसतन प्राप्त कर सकते हैं ।

बीमारियां एवं कीट नियन्त्रण

बीमारी बेबीकोर्न में अधिक नहीं लगती । लेकिन पौध-गलन छोटी अवस्था में लगती है जिसके लिये बेवस्टीन, डाइथेन एम-45 का 1.5% के घोल का स्प्रे करें । इसकी पत्तियों पर धब्बे भी लगते हैं । ये भी उपरोक्त उपचार से नियन्त्रण हो जाते हैं । कीट नियन्त्रण हेतु एण्डोसल्फान, रोगोर, मोनोक्रोटोफास का 1% का घोल बनाकर छिड़कें । कीट-एफिड्‌स, भिनका तथा केटरपिलर कभी-कभी लगते हैं जिन्हें उपरोक्त उपचार से रोका जा सकता है ।

हरे चारे की उपज (Yield of Green Fodder)- इन बेबीकोर्न की फसल प्राप्त करने के पश्चात् हरा चारा भी पौधों से वसूल या प्राप्त किया जा सकता है । इस प्रकार से हरा चारा भी किस्म के अनुसार 250 से 400 क्विंटल प्रति हैक्टर प्राप्त होता है ।

बेबीकोर्न का बाजार मूल्य 30 रुपये प्रति कि.ग्रा. तथा हरे चारे का 70 रुपये प्रति क्विंटल होता है ।

आर्थिक लाभ– इस प्रकार से सभी खर्चे निकाल कर

बेबीकोर्न- 2000 किलो * 30 रूपये = 60,000 रुपये

हरा चारा- 25000-40000 किलो * 70 रुपये = 17,50,000-28,00,000 = 60,000 + 175000 = 235000

60000 + 280000 = 340000

एक लाख खर्च-1,00000 शुद्ध लाभ = 3 लाख रुपये

उपरोक्त बेबीकोर्न की फसल कृषकों एवं सब्जी उत्पादकों के लिये एक उद्योग का दर्जा प्राप्त करा सकती है । यदि थोड़ी मेहनत, थोड़ी लगन हृदय को छू जायें । क्योंकि आज का समय बेरोजगारी का है लेकिन कृषि व्यवसायियों में भी कृषि स्नातकों एवं उन्नतशील कृषकों के लिये ऐसी सब्जी की फसलें एक चमत्कार बन सकती हैं । अत: शिक्षित बेरोजगारों को अवश्य उगानी चाहिए जिससे अधिक लाभ मिल सके।

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